केंद्र सरकार ने न्याय व्यवस्था को तेज करने की दिशा में एक बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 4 नवंबर 2026 को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों (एफटीएससी) की केंद्र प्रायोजित योजना को 1 अप्रैल 2026 से अगले पांच वर्षों के लिए, यानी 31 मार्च 2031 तक, जारी रखने की मंजूरी दे दी गई। इस योजना के तहत देशभर में कुल 850 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें संचालित होंगी, जिनमें बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए समर्पित पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि इस विस्तार से लंबित मामलों का तेजी से निपटारा होगा और पीड़ितों को समय पर न्याय मिलेगा।
इस योजना पर कुल 3788.04 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 2353.15 करोड़ रुपये और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की हिस्सेदारी 1434.89 करोड़ रुपये होगी। योजना 29 भागीदार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगी। वर्तमान में देश में 779 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें काम कर रही हैं, जिनमें 399 समर्पित पॉक्सो अदालतें शामिल हैं। नए विस्तार के तहत लंबित मामलों के बोझ के आधार पर अतिरिक्त जिलों को भी इस दायरे में लाया जाएगा, ताकि जिन जिलों में मामले ज्यादा अटके हैं, वहां भी त्वरित सुनवाई की व्यवस्था मजबूत हो सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लोगों के लिए शीघ्र न्याय सुनिश्चित होगा और न्याय में देरी कम होगी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि सरकार महिलाओं के खिलाफ अपराध और अगली पीढ़ी की सुरक्षा से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी केंद्र के इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि फास्ट ट्रैक अदालतों के विस्तार से तेज न्याय की राह और मजबूत होगी। सरकार का मानना है कि विशेष अदालतों की यह व्यवस्था सामान्य अदालतों पर बोझ कम करती है और संवेदनशील मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देती है।
फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की योजना का मकसद ही यह है कि गंभीर और संवेदनशील मामलों में पीड़ितों को सालों तक इंतजार न करना पड़े। जब किसी मामले की सुनवाई तेजी से होती है तो गवाहों की याददाश्त ताजा रहती है, सबूतों की विश्वसनीयता बनी रहती है और पीड़ित परिवार को मानसिक रूप से लंबी कानूनी लड़ाई से राहत मिलती है। पांच साल के इस विस्तार से राज्यों को अदालतों के संचालन, बुनियादी ढांचे और सहायक व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने का अवसर मिलेगा। न्याय में तेजी का सीधा असर समाज के भरोसे पर पड़ता है — जब लोग देखते हैं कि कानून अपना काम समय पर करता है, तो व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास और मजबूत होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
1. फास्ट ट्रैक विशेष अदालत योजना कब तक बढ़ाई गई है? — केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक, यानी पांच वर्षों के लिए जारी रखने की मंजूरी दी है।
2. इस योजना पर कुल कितना खर्च होगा? — कुल 3788.04 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 2353.15 करोड़ रुपये और राज्यों की हिस्सेदारी 1434.89 करोड़ रुपये है।
3. कुल कितनी अदालतें संचालित होंगी? — देशभर में 850 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें संचालित होंगी, जिनमें समर्पित पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। वर्तमान में 779 अदालतें काम कर रही हैं, जिनमें 399 पॉक्सो अदालतें हैं।
4. इस विस्तार से आम लोगों को क्या फायदा होगा? — लंबित गंभीर मामलों की सुनवाई तेजी से होगी, जिससे पीड़ितों को शीघ्र न्याय मिलेगा और न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा।
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